Tuesday, December 18, 2018

2018/06/10 DAY TWO- अविस्मरणीय कुमाऊँ हिमालय (Part 3/5) : यात्रा जारी जागेश्वर धाम से पाताल भुवनेश्वर

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हमने पिछले भाग में पढ़ा की हम शाम को जागेश्वर धाम के प्रथम दर्शन एवं सांध्य आरती के पश्चात रामलीला का मंचन देखने के बाद अपने कमरे में जाकर सो गए थे , अब आगे ,


10- जून- 2018 सुबह जल्दी उठ कर हम दोबारा जागेश्वर दर्शन को गए, हलकी बारिश अभी भी हो रही थी जागेश्वर किनारे बहने वाली छोटी सी सरिता बहुत ज्यादा प्यारी लग रही थी l कुबेर मंदिर और डंडेश्वर मंदिर समूह भी दर्शन करने के बाद हम वापस अरतोला गाँव की तरफ आये और अल्मोड़ा की तरफ ना जाके अपिथौरागढ़ की तरफ जाने का निश्चय किया ,इस रोड पर थोडा ही आगे झंकार सैम देवता का मंदिर है जिसकी पहाडियों में बड़ी मान्यता है , और फिर गुरनाबाज-कफलीखान-दन्या होते हुए हम आगे बड़े, कफलीखान से एक सड़क वापिस प्लेन की तरफ जाती है वाया चम्पावत, अगर आपको अपने घर की याद सता रही तो वाया चम्पावत-टनकपुर आप इस रस्ते को पकड़ कर वापस जा सकते हैं l काफलीखान में हमने एक स्विफ्ट डिजायर काफी गहरी खाई में पड़ी देखी, सच में कितने क्रूर हैं हैं यह पहाड़ मगर फिर भी कितने प्यारे और जीवंत l
आगे धौलादेवी टाउन आया जहाँ पर धौलादेवी मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ , एक बहुत जरुरी बात की इस मंदिर के पुजारी भी बड़े अछे लगे , बड़े प्यार से उन्होंने हमारे तिलक लगाया और चरनामृत दिया और वो भी बिना किसी दक्षिणा की आस के. सही बात तो ये है है की उत्तराखण्ड था तो हर इंसान की तरह पुजारी जी को भी प्यारा इंसान तो होना ही था l इसी तरह डंडेश्वर मंदिर के पुजारी जी ने हमे बड़े प्यार और सहूलियत से तिलक लगाया था, हम यूपी वालो के लिए इंसान और विशेषकर तीर्थस्थल के पुजारी का इतना मधुर स्वभाव किसी बड़े आश्चर्य से कम बात नहीं होती l
दन्या से आगे बड़ते ही लगातार हमने महसूस किया की हम उंचाई खोते जा रहे हैं मतलब हम लगातार नीचे उतरते जा रहे थे , दन्या से पनार तक का रास्ता बड़ा खतरनाक है जिसपर लगातार पत्थर गिरते रहते हैं , अगर आपकी कार पर भी कोई पत्थर जोरदार आवाज़ के साथ ऊपर से अचानक गिरे तो अपना बैलेंस मत खोइए और शांति से आगे बड़ते रहिये और  हाँ अगर कोई पत्थर खुद कार के आकर के समतुल्य है तो आप खुद कभी आगे नहीं बड़ पायेंगे l इधर के पहाड़ ज्यादा ही दरकते हुए लगे l हम जागेश्वर (समुद्र तल ऊंचाई 2000 मीटर लगभग) से पनार (समुद्र तल से 600 मीटर) तक नीचे आ चुके थे, पनार में काफी गर्मी महसूस हो रही थी , पनार एक छोटा क़स्बा है जहाँ कल कल बहती पानी से लबालब सरयू नदी के किनारे एक चाय की दूकानवाले ने हमारा ज्ञान यह बता के बढाया की पनार पर तीन जिले परस्पर मिल रहे हैं और वो भी उसकी चाय की दूकान के एकदम सामने , पिथौरागढ़, चम्पावत और अल्मोड़ा जिले और वो चाय की दूकान इस त्रि-मिलन बिंदु पर ही थी , सरयू नदी पार करते ही हम अल्मोड़ा जिले से पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट तहसील में आ पहुचे थे, जबकि जिन्हें पिथौरागढ़ जिले के मुख्यालय जाना होता है वो पनार से सरयू पार किये बिना चम्पावत के पहाड़ के किनारे चलने वाली दाये जाने वाली सड़क पकड़ते हैं, जो की शुरू में कई किलोमीटर चम्पावत जिले में चलती है l पनार में ही दूर से एक पत्थर क्रश करने का प्लांट भी देखा, उसके अलावा वहां इंडस्ट्री के नाम पर कुछ और नहीं दिखा l पनार से गंगोलीहाट को बड़ते ही यकायक हमने महसूस किया की हम पूरी सड़क पर दूर-दूर तक एकदम अकेले थे, और पहाड़ की उंचाई फिर बड़ने लगी , दाई ओर दिखने वाला पहाड़ तो आज भी अपने आकार को लेकर दिमाग से नहीं भुलाया जाता, उसी पहाड़ के पीछे पिथौरागढ़  स्थित है, उस पर्वत का गहन अध्ययन करने पर पता चला कि वह वास्तव में पिथौरागढ़ शहर का सबसे ऊँचा पर्वत है (उंचाई लगभग 2500 मीटर), पनार के पास किसी भ पहाड़ का बेस ऊंचाई 500 मीटर लगभग और इसका शखर 2500 लगभग , इसका मतलब अपनी आंखन के सामने हम 2000 मीटर की दैत्याकार ऊंचाई का पहाड़ देख रहे थे , और ये दृश्य दुर्लभतम है , ज्यादातर आपको ऊँचे पहाड़ दिखेंगे लेकिन उनका तलहटी भी काफी हाइट पर होगा ( इस इंग्लिश में प्रोमिनेंस Prominence कहते हैं ) l उस भीमकाय पर्वत के शिखर पर थाल-केदार नाम का हजारो वर्ष पुराना एक शिवलिंग है जिसे समस्त पिथौरागढ़ निवासी बड़ी श्रद्धा एवं भक्ति से पूजते हैं, लेकिन हम स्वयं भी एक बहुत बड़े पहाड़ पर चड़ते जा रहे थे यह कार से सर बाहर निकल कर पता चला , आसमान जैसी उंचाई पर टंगे हुए भरी भरकम चट्टानों और शिलाओ को देखकर सहम कर सर अन्दर कर लिया , यहाँ हम कच्चे आम तोड़ने के लिए रुके  क्योकि अलका जी और पूनम जी दोनों को ही खूब सारे फ्री के आम देखकर कण्ट्रोल नहीं हुआ , यहाँ सड़क किनारे हाथ बढ़ाकर आम तोड़े गए और नमक के साथ बाकी सफ़र में निपटाए गए , यह रास्ता एकदम निर्जन है और हमे अपनी गलती का एहसास हुआ की हमे इस रस्ते ना आकर अल्मोड़ा जाकर उधर से वाया राई-आगर होक पाताल भुवनेश्वर जाना चाहिए थाl खैर अब बहुत कठिन – खतरनाक- और निर्जन रास्ता पार करके बहुत दूर आ चुके थे , अगर आप एकदम निर्जन इलाको से डरते हैं तो यह मार्ग कभी ना अपनाने की सलाह दी जाती है , यह खतरनाक मार्ग (पनार से गंगोलीहाट – NH- 309A) इतना निर्जन लगा की कोई इमरजेंसी हो तो कोई मदद करने भी नहीं आये साथ ही साथ यह आपके वाहन चलाने की कौशल की पराकाष्ठा को भी चुनौती देने वाला एक थकाऊ मार्ग है , गंगोलीहाट एक 1700-1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तहसील मुख्यालय है , और हमे सोच कर ही कष्ट हो रहा था की जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ जाना इतना दूभर होगा , उसके लिए वापस पनार तक नीचे जाना पड़ता होगा और फिर पिथौरागढ़ तक चड़ना पड़ता होगा l सच में पहाडो का जीवन उतना आसान नहीं l

गंगोलीहाट में हाट कालिका मंदिर (काली मंदिर)  मुख्य आकर्षण है, जो पूरे तहसील का सबसे बड़ा धाम है  l इसी राजमार्ग पर आगे बड़ने पर गुप्तादी मार्किट से दाई ओर पाताल भुवनेश्वर का मार्ग कट जाता है , जिसपर कुछेक किलोमीटर चलने के बाद पाताल भुवनेश्वर धाम आ जाता है, यहाँ ठहरने की उतनी जगहे नहीं है, एक पार्वती रिसोर्ट नाम का महंगा रिसोर्ट भी है , लेकिन आपको बजट रूम आसानी से मिल जाएगा, हमे शिवम् पैलेस में 1200 रुपए में 4 लोगो  लायक एक अच्छा सा कमरा मिल गया , अगर आपकी किस्मत साथ देगी तो इस होटल के टेरिस से आपको त्रिशूल, नंदादेवी, सुनंदा देवी, नंदाखाट और पंचाचूली की बर्फीली चोटियों का विहंगम दृश्य नसीब हो सकता है जो की मई जून में लगभग असंभव है , फिर भी खुसनसीबी हमे शाम को थोड़ी देर के लिए पंचाचूली का और किसी और अज्ञात छोटी के दर्शन हुए , लगा जैसे यात्रा सफल हो गयी l 5 बज जाने के कारण हमे आज मंदिर में प्रवेश नहीं मिल पाया , तो हम निकल लिए मंदिर के ऊपर से जाती पगडण्डी रास्ता पर थोडा कोशिश करके चढ़ के पीछे एक गाँव की तरफ को , जहाँ एक बड़ा शांत घास का मैदान मिला जहाँ से दूर कहीं एकदम पूरब दिशा में एक अल्पकालीन झलक हिमालय के किसी चोटी की दिखी, बाद में जब उसका नाम ढूंढा गया तो ज्ञात हुआ की वो नेपाल हिमालय की धारचूला जिले में स्थित जेठी-बहुरानी पीक है जिसकी ऊंचाई लगभग 7000 मीटर है , इसका शेप भी एकदम नुकीला जैसे पंचाचूली चोटी की तरह है , और अपनी अलग ही सुन्दरता है इसकी, उसके बारे में उस समय वहां के लोकल निवासियों से नहीं पता चल पाया था साथ ही लोकल निवासियो द्वारा बहुत सी जानकारियाँ जिसमे एक यह की पाताल भुवनेश्वर मंदिर में हमेशा से पुजारी भंडारी परिवार के होते हैं और दूसरा ये की जहाँ हम बैठे हुए थे वहां शाम ढलने के बाद तेंदुआ महाराज कभी भी आ सकते हैं , अच्छा जी, सांस अन्दर , मिस्टर इंडिया वाला बटन दबा और सीधे कमरे पर प्रकट होकर सांस ली l 

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