ॐ
सबको सादर प्रणाम, सत श्री अकाल,
ll ब्लॉगिंग और यात्रा ब्लॉग का यह सर्वप्रथम ब्लॉग और लेखन का थोडा सा प्रयास परमपिता परमेश्वर को समर्पित ll
मानव शरीर में प्रभु ने दिमाग सबसे ऊपर दिया ताकि मनुष्य सोचे, और सोचे और खूब सोचे की जीवन में उसे क्या चीज सबसे ज्यादा लुभाती है , जैसे मुझे स्वयं के अन्दर रेलवे, और घूमने में विशेष अभिरुचि लगती है और हाँ ट्यूबलाइट की तरह और अन्य लोगो के विपरीत मुझे भी खुद की अभिरुचियां पहचानने में काफी समय लगा, जब तक बेरोजगार था जनरल टिकेट ले ले कर दूर दूर यात्राएं की , फिर नौकरी लगने पर और विशेषकर दूसरी नौकरी रेलवे में लगने पर फ्री में ट्रेनों में घुमने का सपना पूरा होने का आभास होता लगा, लेकिन छुट्टियों की अति अल्पता के कारण ये भी मृगमरीचिका सिद्ध हुआ ll
घुमक्कड़ी में ऊँची भूमियां (पहाड़ पठार इत्यादि), एतिहासिक स्थल तथा घने जंगल मुझे विशेष रूप से आकर्षित करते हैं, कई बार बिना कुछ सोचे किसी पहाड़ पर चढ़कर सबसे ऊँचा बिंदु खोजने की बालहठ अन्दर जाग जाती है, तो कभी किसी ऐतिहासिक स्थल पर जाकर एकदम से अन्दर पुरातत्विद जाग उठता है, तो कभी किसी सरिता को पकड़ उसके उद्गम से अंत तक का पता लगाने का शौक चढ़ जाया करता है, घुमक्कड़ी का कीड़ा जिसे काट ले उसका यही हाल l बरेली निवासी होने की वजह से हिमालय और गंगा से एक अपनापन वाली अनुभूति महसूस होती है, बरेली को कुमाऊँ का द्वार भी कहा जाता है, बरेली के बारे में विस्तृत वर्णन किसी और ब्लॉग में करेंगे, फिलहाल ये यात्रा सीरीज वर्णन हमारी कुमाऊं की कुछ अनोखी यादो को समेटे हुए . लिखने के एकदम पहले पहले प्रयास में कुछ गलतियां भी आपको नज़रअंदाज करनी पड़ेंगी ll
गत वर्ष जून 2017 की मसूरी, केम्पटी, धनौल्टी,
टिहरी, ऋषिकेश, हरिद्वार, देहरादून, सिद्धबली_कोटद्वार, लैंसडाउन यात्रा की भांति
इस वर्ष (2018) भी हमने एक लम्बी यात्रा अपने सबसे पसंदीदा गंतव्य हिमालय की ओर
प्लान की , पिछले बार गड़वाल को साधा था तो अबकी शायद कुमायूं की बारी थी, वैसे जून-जुलाई
में हिमालय की तरफ यात्रा ना करने की सलाह देना चाहूँगा , वजह कई अन्होने
खतरे जैसे बादल फटना, भू-स्ख्लन इत्यादि
हैंl
फिर भी छुट्टियों की उपलब्धता एक बड़ा कारक होता
है आपकी किसी भी यात्रा की प्लानिंग में l लेकिन हर बार की तरह इस बार भी कोई
बुकिंग नहीं और कोई प्री-प्लानिंग नहीं की कहाँ जाना है और कहाँ नहीं l
8- जून-2018 ऑफिस बंद करवाने के बाद गाजियाबाद से हम दोनों
प्राणी ( मैं और श्रीमती जी ) मुरादाबाद तक उत्तराखंड संपर्क क्रांति से गए, वहां से परममित्र
मनोज वर्मा एवं श्रीमती अलका वर्मा ने अपनी कार से हमे अपनी ससुराल के पास कटघर से लेते हुए काशीपुर तिराहे से बाए मुड़ के
हल्द्वानी के लिए निकल लिए. रास्ते में रामनगर एवं कालाढूंगी भी अँधेरी रात में
दिख गया, रामनगर तक हमे वीकेंड की कॉर्बेट पार्क की कुछ भीड़ मिली, लेकिन उसके बाद
वाया कालाढूंगी- आम्रपाली कॉलेज होते हुए हमें हल्द्वानी तक लगभग सूनसान ही मिला.
यात्रा को इकोनोमिकल बनाने के उद्देश्य से काठगोदाम स्टेशन के ठीक सामने जिस गेस्ट
हाउस में हम पिछली बार रुके थे , एकदम वहीँ जाकर दरवाजा खटखटाया , जवाब मिला की मामला हाउस फुल है, अब रात के 11 बजे 2 महिला सदस्यों के साथ होने की वजह से रुकने
की समस्या आन पड़ी, नहीं तो कोने में कार खड़ी करके रात कार में ही बिताने का अनुभव
भी अपने पास है , गूगल मैप के दिखाए सारे होटल पर कॉल करते जा रहे थे जवाब वही मिलता गया ,
हल्द्वानी तक वापस आ गए काठगोदाम से चलकर, वहां होटल SV के सामने होटल गगनदीप
रीजेंसी खाली मिला, जिसका गूगल मैप लिंक https://goo.gl/maps/vuY7HPNYLwF2 ये है , आपातकालीन में हल्द्वानी में यह होटल खाली मिल सकता है , वजह इसकी
लोकेशन है जो थोडा अन्दर गली में है पड़ता है ( रानी बाग़ इलाके में गुरुद्वारा
गुरुनानाक्पुरा के पास) , फिलहाल बेहतरीन
कमरे ( ऐसी और कूलर इत्यादि) और अच्छी व्यवस्था है, हमने बंद कमरे की जगह ओपन डारमेट्री लेना पसंद किया जो कि 300 रुपया
प्रति व्यक्ति गयी, क्योकि फिर अगली सुबह
जल्दी उठ के निकलना था. काउंटर पर बैठे लड़के के फ़ोन में बज रहा था - " बेडू पागो बारो मासा" ...
( हल्द्वानी से लेकर भीगते अल्मोड़ा की सडको एवं देवदार से महकते जागेश्वर धाम तक की यात्रा)
..........जारी अगले हिस्से में
( हल्द्वानी से लेकर भीगते अल्मोड़ा की सडको एवं देवदार से महकते जागेश्वर धाम तक की यात्रा)
..........जारी अगले हिस्से में
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