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हमने पढ़ा की हमारी यात्रा का प्रारब्ध हो चूका था , और हम रात्रि विश्राम के लिए हल्द्वानी रुके थे अब आगे ....!!
9- June-2018 सुबह जल्दी उठ
के तैयार हुए तो पाया आसमान में हल्के बादल थे, उत्तराखंड में बादल देख कर दुःख
होता है जिसकी एक वजह जून 2013 को आई दैवीय आपदा और दूसरी वजह सुन्दर दृश्यों का
धुंध में गायब हो जाना है l खैर वजह चाहे जो भी हो बादल देख कर उतनी ख़ुशी नहीं
हुई. थोडा तेजी दिखाते हुए हमने शीतला माता मंदिर पार करते हुए रानीबाग के आगे से
भीमताल वाला मार्ग पकड़ा, साथ ही शीतला माता से ये वादा किया की लौटते समय आपके
दर्शन अवश्य करेंगे , इधर मौसम एकदम पलटी खाया और काले घने बादल एकदम फुहार छोड़ने
लगे, हल्का जलपान निपटाते हुए मक्खन वाला भुट्टा खाया जो की पूरी यात्रा का सबसे
स्वादिष्ट भोजन था l
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| हल्द्वानी से प्रस्थान से पूर्व हमारे मुस्कुराते चेहरे :) |
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| काठगोदाम से निकलते ही रानीबाग क्षेत्र में शीतला माता द्वार के प्रथम दर्शन ll |
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| अप्रतिम अद्वतीय सौन्दर्य (काठगोदाम भीमताल के मध्य) |
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| साक्षात् भीमताल |
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| भीमताल - साइड से पार करते हुए |
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भीमताल की ओर
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भीमताल बाईपास ( शहर का यह हिस्सा एक घाटी की तरह काफी समतल और चारो तरफ पहाडो से घिरा हुआ है )
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धीरे धीरे भीमताल करीब आने लगा , ट्रैफिक पुलिस ने हमे बाईपास
वाला रास्ता पकड़ने को कहा , भीमताल के किनारे कुछ पल बिताने के बाद हम आगे बड़े,
भीमताल में एक बहुत खूबसूरत सी चीज जो मेंरे जैसे रेलप्रेमियो के लिए किसी आश्चर्य
से कम ना थी वो यह की कंट्री इन नाम के बहु-सुविधा होटल के गेट पर एक खूबसूरत सा नेरो
गेज रेलवे का भाप–इंजन सजा के रखा गया है , इसे मैंने बचपन में भी अल्मोड़ा जाते
हुए वर्ष 2005 में भी देखा था l
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| Airforce Station Bhowali. |
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| सैनिक स्कूल घोडाखाल (मेरे पिताजी का बचपन का मुझे यहाँ पढ़ाने का सपना था ) |
आगे बड़ने पर घनी धुन्ध और हलकी बारिश में एक कार
को फॉलो करते करते गलती से हम भवाली मार्ग छोड़कर भवाली वायु सेना स्थल तथा और भी
आगे गलत बड़ते हुए सैनिक स्कूल घोडाखाल पहुच गये, उससे भी और आगे पड़ने पर एक
स्थानीय निवासी महिला ने हमे बताया की हम एकदम गलत रस्ते पर है जो की मुक्तेसर या
रामगढ की तरफ जा रहा था, भवाली- अल्मोड़ा जाने के लिए हमे राष्ट्रीय राजमार्ग
संख्या 109 पकड़ना था वापस , फिर बैक गियर और सही मार्ग पकड़ना और परम पूज्य नीम
करोरी कैंची धाम के सामने से गुजरते हुए फिर एक वायदा की वापसी में हम दर्शन जरूर
करेंगे l छाडा गाँव के पास गरमपानी ब्रिज से रानीखेत का रास्ता अलग हो गया, आगे का
मार्ग अल्मोड़ा तक थोडा खतरनाक है , कारण लगातार गिरते पत्थर और भू-स्ख्लन, जिसके
चेतवानी बोर्ड जहाँ तहां लगे हुए भी है , इस मार्ग पर आप हिमालय की उत्पत्ति के
साक्ष्य देख सकते हैं, की किस तरह टेथिस सागर से इस महान पर्वतमाला का जनम पर्त दर
पर्त हुआ, इन हिमालयी चट्टानों में समुद्री जीवो की जीवाश्म आज भी लगातार मिलते
हैं l
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| दूर से दर्शन : नीम करौरी धाम |
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| करौरी धाम के आस पास लगा तगड़ा जाम |
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| किसी को चाहिए हो तो ;) |
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| परम पूज्य नीम्ब करौरी धाम |
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| रानीखेत मार्ग का - भवाली अल्मोड़ा मार्ग से मिलन बिंदु |
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| निकट करौरी धाम |
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| बर्षा के उपरान्त सम्मोहित करते शिवालिक पहाड़ |
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| इस बोर्ड पर चेतावनी है की आगे पत्थर गिरने का खतरा है , ऐसे कई बोर्ड करौरी से अल्मोड़ा के बीच है , लगातार भूस्खलन होता रहता है |
एक छोटी सी सरिता लगातार कैंची धाम से लेकर
अल्मोड़ा तक राहगीरों को अकेले ना होने का एहसास दिलाती है, एक स्थान पर आप अपनी गाडी नीचे एकदम नदी तक ले
जा सकते हैं (बरसात के मौसम में ऐसा ना करने की सलाह दी जाती है क्योकि पहाडो में
बरसात में पानी कई बार एकदम तेज़ी से ऊपर बढता है, जिसे फ़्लैश फ्लड कहते हैं)l










दोपहर हो चुकी थी लेकिन आसमान में छाये घने काले मेघो की वजह से ठण्ड का एहसास हो
रहा था, आगे काकडीघाट- जौरासी - सुल्याबारी – लाट जैसे कई छोटे छोटे गाँव को पार
करते हुए हम अल्मोड़ा की तरफ तेज़ी से बड़ने लगे, काकड़ीघाट में कभी स्वामी विवेकानंद
जी ने ध्यानयोग किया था जिसके साक्ष्य आज भी मौजूद हैं, हमारा लक्ष्य रात तक जागेश्वर धाम पहुचने का था, अल्मोड़ा शहर को
बाईपास करते हुए उत्तराखंड जैव विविधता उध्यान- मृग विहार (चिड़ियाघर) पड़ा, तो उसे भी एक गंतव्य मानते हुए
हमने टिकट लेकर उसका भ्रमण करना उचित समझा , अल्मोड़ा का चिड़ियाघर अभी शुरूआती
अवस्था में है , जहाँ केवल 3-4 तेंदुए ( जिनके नाम नंदिता, टीटू और मालती हैं और
सब के सब यहाँ आदमखोर होने की सजा काट रहे हैं ), साथ ही बड़ा प्यारा सा भालू मिला
जिसका नाम रामू है और जिसके शांत स्वभाव से सारा अल्मोड़ा परिचित है, हमारे साथ
वहाँ प्रवेश की हुई एक स्थानीय महिला तो ऐसे बुला रही थी जैसे कोई परिवार का सदस्य
हो - “रामू कैसे हो, रामू खाना खाया, रामू
क्या हुआ” ll अद्वीतीय है पहाडियों का भोलापन और प्रकृति के लिए उनके ह्रदय का
प्यार l
गूगल मैप हमे बता रहा था की हमारा अगला पड़ाव यहाँ
से बहुत दूर नहीं है , जी हाँ हम चितई गोलू देवता मंदिर के मंदिर से बहुत दूर नहीं
थे , मार्ग में पड़ने वाले दाना-गोलू-देवता को प्रणाम करते हुए हम चितई गोलू देवता
पहुचे , माना जाता है की चितई गोलू देवता न्याय के देवता हैं तथा चम्पावत-पित्थोरागढ़
निवासियों के इष्ट देवता हैं, जिनके दरबार में रोजाना सैकड़ो लोग अपनी लिखित विनती
लेकर पहुचते हैं, अन्य कई किवदंतियां भी गोलू देवता की महानता व्यक्त करती हैं , आपको मंदिर में हजारो घंटिया- स्टाम्प पेपर
कागज़ पर लिखी विनतियां आदि मिल जायेंगी , इस मंदिर के बंदरो से अत्यधिक सावधान
रहे, प्रवेश करते पर ही बंदरो ने पत्नी-श्री के हाथो से खाने योग्य सारा प्रसाद
ग्रहण कर लिया था l














पर्याप्त समय यहाँ गुजारने के पश्चात शाम घिरती देख हमे
जागेश्वर पहुचने की चिंता सवार हुई तो एक्सेलरेटर को थोडा और दबाया गया , यदि आपके
पास समय हो तो यहाँ से लगभग 4-5 किलोमीटर आगे
लाखुदियार रॉक पेंटिंग साईट भी है जो की भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के अंतर्गत
प्रतिबंधित क्षेत्र है , जहाँ आदि-कालीन रॉक पेंटिंग आज भी दर्शनीय हैं l इसके आगे
बड़ते ही स्टेट बैंक बाड़ेछीना के पास से ही मुनस्यारी- थल- बेरीनाग जाने वाला मार्ग
अलग हो जाता है तथा अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ जाने वाला मार्ग आगे अरतोला गाँव की तरफ बाद जाता है जिसपर अरतोला
गाँव से बायीं ओर लगभग 3 किलोमीटर अन्दर
की तरफ (ऑफ-रोड) जागेश्वर धाम है, वहीँ बीच में एक मार्ग अलग हुआ जो की वृद्ध-
जागेश्वर की तरफ जाता है जो की 3-4 किलोमीटर दूर है, दोनों ही स्मारक अति प्राचीन है एवं भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के
आधीन हैं , आप पहले वृद्ध जागेश्वर की तरफ जा सकते हैं , जिसके बाद वापस अरतोला
आने की आवश्यकता नहीं, आगे से ही नीचे अपना वाहन ला सकते हैं उतार के , खैर हमने
सीधे जागेश्वर जाने का निर्णय लिया l जागेश्वर के पास पहुचते ही आपको किसी अलग लोक
में होने का एहसास होने लगता है , देवदार के सुगन्धित पेड़ और बहती हुई छोटी सी सरिता
आपका स्वागत जागेश्वर धाम में करती है l







यहाँ बिलकुल मंदिर के ही पास रुकने के पर्याप्त
विकल्प हैं , लेकिन थोड़े महंगे l अगर रविवार या फिर और कोई पब्लिक हॉलिडे है तो
अँधेरा होने के बाद आपको कमरा मिलना मुश्किल है कारण पहले ही सारे कमरे घिर जाते
हैं, जागेश्वर एक छोटा सा क़स्बा है , हमने कई लोगो को वहां रात अपनी कार में
बिताते हुए भी देखा l हम खैर शाम होने से काफी पहले वहां पहुच चुके थे जिसका लाभ
हमे यह मिला की सूर्यास्त हमने मंदिर के प्रांगण में बिताया और संध्या- दर्शन-आरती
का पुन्य भी प्राप्त हुआ , लेकिन जागेश्वर पहुचते ही हमने सबसे पहली प्राथमिकता
रुकने के प्रबंध को दी , ज्यादातर गेस्ट हाउस और होटल भर चुके थे, रुद्राक्ष गेस्ट
हाउस में हमे 2000 रुपए में एक छोटा सा कमरा मिला, जो सीलन से भरा था और हाँ एक
बड़ी सी डरावनी दिखने वाली पहाड़ी मकड़ी भी उसी किराए में हमारे साथ रहने वाली थीl
जागेश्वर धाम के बारे माँ कहा गया है की यह कैलाश
मानसरोवर मार्ग में पड़ता है , तथा यह उत्तराखंड का पांचवा धाम और सबसे बड़ा मंदिर
समूह भी है, और इसकी स्थापना स्वयं आदि गुरु शंकराचार्य जी ने की थी , यहाँ कुल
125 छोटे- बड़े मंदिरों का समूह है जो आठवी से लेकर अठारवी शती ईसवी में विभिन्न
शासको द्वारा बनवाए गए तथा केदारनाथ शैली में ही बनाए गए हैं , किवदंती है की
मंदिर का निर्माण पांड्वो ने कराया, वास्तविक निर्माण कत्युरी शासको (सातवी शती)
के समय में शुरू हुआ था और अंत में चन्द शासको ( अठारवी शती) के काल तक पुनरुद्धार
होता रहा l कुछ मंदिर समूह थोड़ी दूरी पर भी स्थित हैं जैसे कुबेर मंदिर समूह एवं
डंडेश्वर मंदिर l
रात को भोजन के पश्चात वहां हो रही रामलीला के
दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसे वहीँ के लोकल निवासियों द्वारा प्रायोजित किया जा रहा था , सभी बच्चे बहुत सुन्दर-सुन्दर और मासूम से थे , और हाँ सभी शर्मीले, वास्तव ने हमारे देश में अगर कहीं सबसे कोमल ह्रदय वाले
और मासूम लोग होते हैं, तो वो केवल हिमालयी पहाड़ी इलाको में l रात को हल्की सी
बारिश ने रात को बेहद सर्द बना दिया था l सोते समय रामलीला के मंचन का रावण का क्रूर अट्ठाहस कानो में सुनाई दे रहा था तथा देवदार की मनमोहक सुगंध नाक को आकर्षित तथा मकड़ी के होने का एहसास आँखों को व्यस्त किये हुए था , फिर भी जागेश्वर बाबा की गोदी में उस रात आनंद भरी नींद आई ll
कार चालन के हिसाब से खतरनाक रास्तो से जाते हुए पाताल भुवनेश्वर तक पहुचने का वृतांत अगले भाग में जारी रहेगा ll
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